हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , मौलाना सैयद रज़ा हैदर ज़ैदी ने नमाज़ियों को तक़वा-ए-इलाही की नसीहत करते हुए कहा कि आज के दौर में मुतकब्बिर ताक़तें कमज़ोरों की मदद नहीं करना चाहतीं बल्कि उन्हें ख़त्म करना चाहती हैं, लेकिन यह बात याद रखनी चाहिए कि अगर कोई मदद करे या न करे, अल्लाह ज़रूर मदद फ़रमाता है।
उन्होंने रहबर-ए-मोअज़्ज़म आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली हुसैनी ख़ामेनेई दाम ज़िल्लह के क़ौल का हवाला देते हुए कहा,ट्रंप मर कर साँप और बिच्छुओं की ख़ुराक बन जाएगा, लेकिन इस्लामी जम्हूरिया-ए-ईरान बाक़ी रहेगा,और दुआ की ख़ुदा इस इस्लामी निज़ाम की हिफ़ाज़त फ़रमाए।
मौलाना ने वाक़ेआ-ए-कर्बला की एक रिवायत बयान करते हुए कहा कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने एक शख़्स से फ़रमाया कि तुम हमारे साथ जिहाद में शरीक नहीं हो सकते क्योंकि तुम मक़रूज़ हो और तुम्हारी गर्दन पर दूसरों का हक़ है। उन्होंने कहा कि माह-ए-रजब और शाबान में महफ़िलें करें, ख़ुशियाँ मनाएँ, लेकिन इस बात का ख़ास ख़याल रखें कि किसी का हक़ ज़ाया न हो और किसी के लिए परेशानी का सबब न बनें।
उन्होंने वज़ाहत करते हुए कहा कि हमारे किसी अमल से किसी के आराम में ख़लल न पड़े, किसी का रास्ता न रुके, और हमारा किरदार ऐसा हो कि लोग आइम्मा-ए-मासूमीन अलैहिमुस्सलाम से क़रीब हों, दूर न हों।
मौलाना ने कहा कि अहले बैत अलैहिमुस्सलाम के फ़ज़ाइल पढ़ने का मक़सद सिर्फ़ सवाब हासिल करना नहीं, बल्कि उनकी सीरत को अपनाना है, ताकि दुनिया देखे कि जब मानने वालों का किरदार ऐसा है तो मोलाओं का किरदार कैसा रहा होगा।
जंग-ए-सिफ़्फ़ीन का वाक़ेआ बयान करते हुए उन्होंने कहा कि जनाब मालिक अश्तर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु दुश्मन के ख़ेमे के इतने क़रीब पहुँच गए थे कि साँसों की आवाज़ सुनाई देने लगी, लेकिन जैसे ही मौला अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम का हुक्म आया, फ़ौरन वापस लौट आए। इससे सबक़ लेते हुए उन्होंने कहा कि हमें भी मासूमीन अलैहिमुस्सलाम की मुकम्मल इताअत करनी चाहिए और अपनी ख़्वाहिशात को कुचलना चाहिए।
24 रजब की मुनासबत से फ़त्ह-ए-ख़ैबर और जनाब जाफ़र तय्यार अलैहिस्सलाम की हब्शा से वापसी का ज़िक्र करते हुए मौलाना ने कहा कि हब्शा ईसाइयों की सरज़मीन थी और ख़ैबर यहूदियों का मरकज़, हब्शा में इस्लाम का परचम जाफ़र तय्यार अलैहिस्सलाम ने बुलंद किया और ख़ैबर में अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम ने।
दोनों हज़रत अबू तालिब अलैहिस्सलाम के फ़र्ज़ंद थे, यानी हर इस्लामी फ़त्ह का रास्ता अबू तालिब के घर से गुज़रता है।
उन्होंने अफ़सोस का इज़हार करते हुए कहा कि मुसलमानों ने अबू तालिब के घर को छोड़ दिया, इसी वजह से आज ज़िल्लत व रसवाई का सामना कर रहे हैं।
नमाज़-ए-जाफ़र तैय्यार का तज़्किरा करते हुए मौलाना ने कहा कि यह नमाज़ इकसीर है और मुश्किलात के हल के लिए मुजर्रब है, इसलिए इसे पाबंदी से पढ़ना चाहिए।
आख़िर में इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम की हदीस बयान करते हुए उन्होंने कहा,जिसकी नीयत में हुस्न आ जाता है, उसके रिज़्क़ में इज़ाफ़ा हो जाता है।
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि रिज़्क़ का ताल्लुक़ नेक नीयत से है, जाली तावीज़ों से नहीं। नीयत ज़बान या ज़ाहिरी अमल से नहीं, बल्कि इंसान के दिली इरादे से ताल्लुक़ रखती है, और जब इस इरादे में ख़ुलूस आ जाए तो वही रिज़्क़ में इज़ाफ़े का सबब बनता है।
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